अपनी दर्द की दास्तान मैं किसको सुनाती ? मैं खुद रो भी नहीं पति थी. मैं कितना चीखती, कितना चिल्लती रही.. मेरी चीख किसी ने भी ना सुनी. ना वो काली रात ने सुनी, जिसके सहारे मैं अपने पलकों मे ख्वाब संजोए सोती थी, ना वो सूनी सड़कों ने सुनी, जिसको मैं अपना मंज़िल समझके चलती थी. कोई भी ना था वहाँ, जो मुझे सहारा देता, जो भी थे वो मेरे बदन को नोच नोच के मुझे दर्द देते रहे, दर्द के साइवा कुछ भी नहीं था मेरे पास, अपनी दर्द की दास्तान मैं किसको सुनाती ? वो पल भी कितने बदनशीब थे मेरे संग संग, संग मेरे चलपडे, चलते चलते उसी आशियाने मे पनाह लिए, जहाँ भेड़िए इंशान की रूप मे रहते थे, हमे उनकी हवस का शिकार बनना पड़ा, मेरी बेबस जिंदेगी को उनके सहारे छोड़ना पड़ा. मेरी मजबूरी पे उनको थ...
इंसान की रूप मे कलयुग का महादेव है बालासाहेब , इस युग से विराम लिए अगले युग मे आएँगे बालासाहेब , एक नये रूपमे, हर युग मे आएँगे बालासाहेब , जिनकी उंगली की नोक पे तलवार की धार , हर बोली मे है जिनकी शेर की दहाड़ , अंत नहीं हुआ उनका बस इस युग से विराम लिए , कलयुग का महादेव है बालासाहेब मानव की मृत्यु होती है , महा मानव की नहीं , भगवान मंदिर , मशजीद हर जगह स्थान लेते है , महा मानव इतिहास बना जाते है , हर इंसान की दिल मे स्थान बना जाते है . महा मानव की रूप मे , कलयुग का महादेव है बालासाहेब , सुनसान हुय हर राह , हर मंज़र , जब बंद हुई उनकी आँखे , थम गयी हवा , स्तब्ध हो गया हिन्दुस्तान , जब बंद हुई थोड़ी देर उनकी सांसे , वक़्त ही थम गया , जब लिए विराम इस युगसे , कलयुग का महादेव है बालासाहेब .
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